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Saturday, January 28, 2012

वैदिक प्रश्न ज्योतिष और शिक्षा विचार

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प्रश्न ज्योतिष से जाने विद्या प्राप्ति के योग

ज्योतिष शास्त्र में कुण्डली के पंचम भाव को महत्वपूर्ण माना जाता हैं। क्योकि पंचम भाव जातक के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं। क्योकि पंचम भाव शिक्षा, बुद्धि और ज्ञान का भाव है, जिससे जातक के जीवन की दिशा निर्धारित होती हैं। ज्योतिष में पंचम भाव को त्रिकोण स्थान भी कहा जाता हैं। पंचम भाव को ज्योतिष में बहुत ही शुभ माना गया है। जातक के शिक्षा से सम्बन्ध में भी विचार पंचम भाव से ही किया जाता हैं। इस लिए प्रश्न ज्योतिष या प्रश्न कुंडली से शिक्षाका आंकलन करने हेतु भी पंचम भाव ही प्रमुख माना गया हैं।
  • पश्न ज्योतिष में शिक्षा का आंकलन करने हेतु लग्न में स्थित ग्रह एवं लग्नेश की स्थिती, पंचम भाव में स्थित ग्रह एवं पंचमेश की स्थिती तथा शिक्षा के कारक ग्रह बुध एवं बृहस्पति की स्थिति से विद्या का आंकल किया जासकता हैं।
  • प्रश्न कुंडली में लग्न, लग्नेश, पंचम भाव, पंचमेश, बुध और बृहस्पति यदि शुभ ग्रहो के साथ हो या शुभ ग्रहो से द्रष्ट हो तो शिक्षा के संबंधित कार्यो में बड़ी सफलता अवश्य मिलती हैं।
  • प्रश्न कुंडली में लग्न, लग्नेश, पंचम भाव, पंचमेश, बुध और बृहस्पति यदि कमजोर स्थिति में हों या या अशुभ ग्रहो से युक्त या द्रष्टी के कारण पीडित हो, तो शिक्षा संबंधित कार्यो में रूकावटों का सामना करना पड सकता हैं।
  • प्रश्न कुंडली का विश्लेषण करते समय अन्य शुभ, अशुभ ग्रहों का दृष्टि या युति संबंध एवं संबंधित ग्रह के मित्र एवं शत्रु ग्रहो का उनपर प्रभाव देखना भी अति आवश्यक होता हैं।
नोट: ज्योतिष शास्त्रो के अनुशार लग्न के साथ में भाव कारक भी बदल जाते हैं। इस लिए प्रश्न कुंडली का विश्लेषण सावधानी से करना उचित रहता हैं। विद्वानो के अनुशार प्रश्न कुंडली का विश्लेषण करते समय संबंधित भाव एवं भाव के स्वामी ग्रह अर्थातः भावेश एवं भाव के कारक ग्रह को ध्यान में रखते हुए आंकलन कर किया गया विश्लेषण स्पष्ट होता हैं। प्रश्न कुंडली का फलादेश करते समय हर छोटी छोटी बातों का ख्याल रखना आवश्यक होता हैं अन्यथा विश्लेषण किये गये प्रश्न का उत्तर स्टिक नहीं होता।

Original source

विद्या और ज्योतिषीय


vidya aur Jyotish | Vidhya or Jyotish, Astrology and Education, Education in Hindu Astrology, सरस्वती और विद्या, विध्या, ज्ञान की देवी सरस्वती, उच्च शिक्षा और ज्योतिष योग


विद्या और ज्योतिषीय

हर माता-पिता की कामना होती है कि उनका बच्चें परीक्षा में उच्च अंकों से उत्तीर्ण हो एवं उसे सफलता मिले। उच्च अंकों का प्रयास तो सभी बच्चें करते हैं पर कुछ बच्चें असफल भी रह जाते हैं। कई बच्चों की समस्या होती है कि कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें अधिक याद नहीं रह पाता, वे कुछ जबाव भूल जाते हैं। जिस वजह से वे बच्चें परीक्षा में उच्च अंकों से उत्तीर्ण नहीं होपाते या असफल होजाते हैं। ज्योतिष के अनुशार असफलता का कारण बच्चें की जन्मकुंडली में चंद्रमा और बुध का अशुभ प्रभाव है।


चंद्रमा और बुध का संबंध विद्या से हैं, क्योकि मन-मस्तिष्क का कारक चंद्रमा है, और जब चंद्र अशुभ हो तो चंचलता लिए होता है तो मन-मस्तिष्क में स्थिरता या संतुलन नहीं रहता हैं, एवं बुध की अशुभता की वजह से बच्चें में तर्क व कुशाग्रता की कमी आती है। इस वजह से बच्चें का मन पढाई मे कम लगता हैं और अच्छे अंकों से बच्चा उत्तीर्ण नहीं हो पाता।

भारतीय ऋषि मुनिओं ने विद्या का संबंध विद्या की देवी सरस्वती से बताय हैं। तो जिस बच्चें की जन्मकुंडली में चंद्रमा और बुध का अशुभ प्रभावो हो उसे विद्या की देवी सरस्वती की कृपा भी नहीं होती। एसे मे मां सरस्वती को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त चंद्रमा और बुध ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम कर शुभता प्राप्त की जा सकती है।

मां सरस्वती को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त करने का तत्पर्य यह कतई ना समजे की सिर्फ मां की पूजा-अर्चना करने से बच्चा परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो एवं उसे सफलता मिल जायेगी क्योकि मां सरस्वती उन्हीं बच्चों की मदद करती हैं, जो बच्चे मेहनत मे विश्वास करेते और मेहनत करते हैं। बिना मेहनत से कोइ मंत्र-तंत्र-यंत्र परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने मे सहायता नहीं करता है। मंत्र-तंत्र-यंत्र के प्रयोग से एक तरह की सकारत्मक सोच उत्पन्न होती है जो बच्चें को पढाई मे उस्की स्मरण शक्ती का विकास करती हैं।


Original source


Monday, May 9, 2011

प्रश्न कुण्डली से जाने स्वास्थ्य लाभ के योग

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प्रश्न कुण्डली से जाने स्वास्थ्य लाभ के योग

सभी व्यक्ति स्वयं के और अपने स्वजनो के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता है। लेकिन हमारा शरीर में विभिन्न कारणो से स्वास्थ्य संबंधित परेशानियां समय के साथ-साथ आती-जाती रहती हैं।
लेकिन यदि बिमारी होने पर स्वास्थ्य में जल्दी सुधार नहीं होता तो, तरह-तरह की चिंता और मानसिक तनाव होना साधारण बात हैं। कि स्वास्थ्य में सुधार कब आयेगा?, कब उत्तम स्वास्थ्य लाभ होगा?, स्वास्थ्य लाभ होगा या नहीं?, इत्यादि प्रश्न उठ खडे हो जाते हैं।

मनुष्य की इसी चिंताको दूर करने के लिए हजारो वर्ष पूर्व भारतीय ज्योतिषाचार्यो नें प्रश्न कुंडली के माध्यम से ज्ञात करने की विद्या हमें प्रदान की हैं। जिस के फल स्वरुप किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य से संबंधित प्रश्नो का ज्योतिषी गणनाओं के माध्यम से सरलता से समाधन किया जासकता हैं!

प्रश्न कुंडली के माध्यम से स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी प्राप्त करने हेतु सर्व प्रथम प्रश्न कुंडली में रोगी के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के योग हैं या नहीं यह देख लेना अति आवश्यक हैं।
आपके मार्गदर्शन हेतु यहां विशेष योग से आपको अवगत करवा रहे हैं।
लग्न में स्थित ग्रह या लग्नेश से रोग मुक्ति के योग।
• यदि लग्न में बलवान ग्रह स्थित हो तो रोगी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ देते हैं।
प्रश्न कुंडली में यदि लग्नेश (लग्न का स्वामी ग्रह) और दशमेश (दशम भाव का स्वामी ग्रह) मित्र हो तो रोगी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ ……………..>>
चन्द्रमा से रोग मुक्ति के योग
• यदि चन्द्र स्वराशि या उच्च राशि मे बलवान हो कर किसी शुभ ग्रह से युक्त हो या द्रष्ट हो तो रोगी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ होते देखा गया हैं।
यदि प्रश्न कुंडली में यदि चन्द्र चर राशि अर्थात द्विस्वभाव राशि में स्थित हो ……………..>>
प्रश्न कुंडली के माध्यम से स्वास्थ्य लाभ में विलम्ब होने के योग देख लेना भी आवश्यक होता हैं।
स्वास्थ्य लाभ में विलंब होने के योग
• सधारणतः जातक में षष्टम भाव व षष्टेश से रोग को देखा जाता हैं।
प्रश्न कुंडली में यदि लग्नेश और दशमेश के बीच ……………..>>
>> Read Full Article Please Read GURUTVA JYOTISH May-2011
यदि प्रश्न कुंडली में स्वास्थ्य लाभ में विलंब होने के योग बन रहे हो तो चिंतित होने के बजाय शास्त्रोक्त उपाय इत्यादि करना लाभदायक सिद्ध होता हैं। एसी स्थिती में विद्वानो के मत से महामृत्युंजय मंत्र-यंत्र का प्रयोग शीघ्र रोग मुक्ति हेतु रामबाण होता हैं।
प्रश्न कुंडली का अध्ययन करते समय यह योग भी देखले की रोगी को उचित उपयार प्राप्त हो रहा हैं या नहीं।
रोग का उचित उपचार होने के योग हैं या नहीं!
प्रश्न कुण्डली में प्रथम, पंचम, सप्तम एवं अष्टम भाव में पाप ग्रह हों और चन्द्रमा कमज़ोर या पाप ग्रह से पीड़ित हों तो रोग का उपचार कठिन हो ……………..>>
>> Read Full Article Please Read GURUTVA JYOTISH May-2011
प्रश्न कुंडली देखते समय शरीर के विभिन्न अंगो पर ग्रहो के प्रभाव एवं बिमारीयों को जानना भी आवश्यक होता हैं।
ज्योतिषी सिद्धांतो के अनुशार कुंडली के बारह भाव शरीर के विभिन्न अंगो को दर्शाते है।
  • प्रथम भाव : सिर, मस्तिष्क, स्नायु तंत्र.
  • द्वितीय भाव: चेहरा, गला, कंठ, गर्दन, आंख.
  • तीसरा भाव : कधे, छाती, फेफडे, श्वास, नसे और बाहें.
  • चतुर्थ भाव : स्तन, ऊपरी आन्त्र, ऊपरी पाचन तंत्र……………..>>
प्रश्न कुण्डली में रोग से संबंधित भाव
प्रश्न ज्योतिष के अनुसार प्रश्न कुंडली में लग्न स्थान चिकित्सक भाव होता हैं। अतः शुभ ग्रह प्रश्न कुंडली के लग्न में शुभ ग्रह की स्थिती से ज्ञात होता हैं की रोगी को किसी कुशल चिकित्सक की सलाह प्राप्त हो रही हैं या होगी।
यदि अशुभ ग्रह स्थित हो तो समझले की रोगी को ……………..>>
नोट: प्रश्न कुंडली का विश्लेषण सावधानी से करना उचित रहता हैं। विद्वानो के अनुशार प्रश्न कुंडली का विश्लेषण करते समय संबंधित भाव एवं भाव के स्वामी ग्रह अर्थातः भावेश एवं भाव के कारक ग्रह को ध्यान में रखते हुए आंकलन कर किया गया विश्लेषण स्पष्ट होता हैं। प्रश्न कुंडली का फलादेश करते समय हर छोटी छोटी बातों का ख्याल रखना आवश्यक होता हैं अन्यथा विश्लेषण किये गये प्रश्न का उत्तर स्टिक नहीं होता।
संपूर्ण लेख पढने के लिये कृप्या गुरुत्व ज्योतिष ई-पत्रिका मई-2011 का अंक पढें।
इस लेख को प्रतिलिपि संरक्षण (Copy Protection) के कारणो से यहां संक्षिप्त में प्रकाशित किया गया हैं।
>> गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (मई-2011)
MAY-2011

>> http://gk.yolasite.com/resources/GURUTVA%20JYOTISH%20MAY-2011.pdf  


Wednesday, May 4, 2011

गुरुत्व ज्योतिष ई पत्रीका मई 2011 में प्रकशित लेख

MAY 2011 free monthly Astrology Magazines, You can read in Monthly GURUTVA JYOTISH Magazines Astrology, Numerology, Vastu, Gems Stone, Mantra, Yantra, Tantra, Kawach & ETC Related Article absolutely free of cost. गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका, गुरुत्व ज्योतिष मासिक ई पत्रीका ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु, रत्न, मंत्र, यंत्र, तंत्र, कवच इत्यादि प्राचिन गूढ सहस्यो एवं आध्यात्मिक ज्ञान से आपको परिचित कराती हैं।

यंत्र, मंत्र, तंत्र द्वारा रोग शांति, वास्तु रोग शान्ति, रोग मुक्ति, रोगो से मुक्ती रोग, निवारण उपाय, टोटके, लाल किताब ज्योतिष रोग निवारण, रोग खत्म करने के उपाय, बीमारी को खत्म करने के उपाय, बिमारी निवारण उपाय, टोटके, स्वास्थ्य, रोग और ज्योतिष, यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र द्वारा बीमारी को समाप्त करने के उपचार के, Hindi Yantra, tantra, mantra Healing for disease, to end of disease Yantra, tantra, mantra Healing आरोग्य लाभ उपाय, Remedy health benefits, Remedy Arogya benefits, Remedy health advantage, Specific Disease, Prevention Disease, Disease consoles Disease freedom, Rogo se Mukti Disease prevention measures, Totkae, Red Book Astrology disease prevention, Indian Vedic Disease Solution, indian Remadu fo Disease Measure, red astro Remedy for Disease, treditnol indian health Ramedy, Remedy to disease eliminate,

યંત્ર, મંત્ર, તંત્ર- રોગ શાંતિ, વાસ્તુ ઉપાય, ટોટકે, લાલ કિતાબ, બીમારી સ્વાસ્થ્ય, જ્યોતિષ, યન્ત્ર, મન્ત્ર, તન્ત્ર દ્વારા બીમારી ઉપચાર, ಯಂತ್ರ, ಮಂತ್ರ, ತಂತ್ರ- ರೋಗ ಶಾಂತಿ, ವಾಸ್ತು ಉಪಾಯ, ಟೋಟಕೇ, ಲಾಲ ಕಿತಾಬ, ಬೀಮಾರೀ ಸ್ವಾಸ್ಥ್ಯ, ಜ್ಯೋತಿಷ, ಯನ್ತ್ರ, ಮನ್ತ್ರ, ತನ್ತ್ರ ದ್ವಾರಾ ಬೀಮಾರೀ ಉಪಚಾರ, யம்த்ர, மம்த்ர, தம்த்ர- ரோக ஶாம்தி, வாஸ்து உபாய, டோடகே, லால கிதாப, பீமாரீ ஸ்வாஸ்த்ய, ஜ்யோதிஷ, யந்த்ர, மந்த்ர, தந்த்ர த்வாரா பீமாரீ உபசார, యంత్ర, మంత్ర, తంత్ర- రోగ శాంతి, వాస్తు ఉపాయ, టోటకే, లాల కితాబ, బీమారీ స్వాస్థ్య, జ్యోతిష, యన్త్ర, మన్త్ర, తన్త్ర ద్వారా బీమారీ ఉపచార, യംത്ര, മംത്ര, തംത്ര- രോഗ ശാംതി, വാസ്തു ഉപായ, ടോടകേ, ലാല കിതാബ, ബീമാരീ സ്വാസ്ഥ്യ, ജ്യോതിഷ, യന്ത്ര, മന്ത്ര, തന്ത്ര ദ്വാരാ ബീമാരീ ഉപചാര, ਯਂਤ੍ਰ, ਮਂਤ੍ਰ, ਤਂਤ੍ਰ- ਰੋਗ ਸ਼ਾਂਤਿ, ਵਾਸ੍ਤੁ ਉਪਾਯ, ਟੋਟਕੇ, ਲਾਲ ਕਿਤਾਬ, ਬੀਮਾਰੀ ਸ੍ਵਾਸ੍ਥ੍ਯ, ਜ੍ਯੋਤਿਸ਼, ਯਨ੍ਤ੍ਰ, ਮਨ੍ਤ੍ਰ, ਤਨ੍ਤ੍ਰ ਦ੍ਵਾਰਾ ਬੀਮਾਰੀ ਉਪਚਾਰ, যংত্র, মংত্র, তংত্র- রোগ শাংতি, ৱাস্তু উপায, টোটকে, লাল কিতাব, বীমারী স্ৱাস্থ্য, জ্যোতিষ, যন্ত্র, মন্ত্র, তন্ত্র দ্ৱারা বীমারী উপচার, ଯଂତ୍ର, ମଂତ୍ର, ତଂତ୍ର- ରୋଗ ଶାନ୍ତି, ବାସ୍ତୁ ଉପାୟ, ଟୋଟକେ, ଲାଲ କିତାବ, ବୀମାରୀ ସ୍ବାସ୍ଥ୍ଯ, ଜ୍ଯୋତିଷ, ଯନ୍ତ୍ର, ମନ୍ତ୍ର, ତନ୍ତ୍ର ମାଧ୍ଯମ ରେ ବୀମାରୀ ଉପଚାର, yaMtra, maMtra, taMtra- roga SAMti, vAstu upAya, ToTake, lAla kitAba, bImArI svAsthya, jyotiSha, yantra, mantra, tantra dvArA bImArI upacAra,

गुरुत्व ज्योतिष ई पत्रीका मई 2011 में प्रकशित लेख
रोग निवारण विशेष
विशेष लेख
महामृत्युंजय-अकाल मृत्यु एवं असाध्य रोगों से मुक्ति7स्वप्न और रोग34
प्रश्न कुण्डली से जाने स्वास्थ्य लाभ के योग9रोग होने के संकेत36
अंक ज्योतिष और स्वास्थ12रत्न एवं रंगों द्वारा रोग निवारण37
ज्योतिष द्वारा रोग निदान16वास्तु एवं रोग40
महामृत्युंजय जपविधि21हस्त रेखा एवं रोग41
उत्तम स्वास्थ्य लाभ के लिये करे सूर्य स्तोत्र का पाठ29जन्म कुंडली में नीच लग्नेश से रोग और परेशानी?43
उत्तम स्वास्थ्य लाभ के लिये शयन और वास्तु सिद्धांत30प्राकृतिक चिकित्सा से उत्तम स्वास्थ्य लाभ47
उत्तम स्वास्थ्य लाभ के लिये भोजन और वास्तु सिद्धांत31रोग निवारण के  सरल उपाय49
सर्व रोग नाशक महामृत्युन्जय मंत्र अचूक प्रभावी32सर्व कार्य सिद्धि कवच50
अनुक्रम
संपादकीय4दिन-रात के चौघडिये68
राम रक्षा यंत्र51दिन-रात कि होरा सूर्योदय से सूर्यास्त तक69
विद्या प्राप्ति हेतु सरस्वती कवच और
यंत्र
52ग्रह चलन मई -201170
मंत्र सिद्ध पन्ना गणेश52सर्व रोगनाशक यंत्र/कवच 71
मंत्र सिद्ध सामग्री53मंत्र सिद्ध कवच 73
मासिक राशि फल56YANTRA LIST 74
राशि रत्न60GEM STONE 76
मई 2011 मासिक पंचांग61BOOK PHONE/ CHAT CONSULTATION77
मई -2011 मासिक व्रत-पर्व-त्यौहार63सूचना78
मंत्र सिद्ध सामग्री66हमारा उद्देश्य80
मई 2011 -विशेष योग67
दैनिक शुभ एवं अशुभ समय ज्ञान तालिका67









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Thursday, April 28, 2011

मांगलिक योग शांति के उपाय

मांगलिक योग का उपाय (Remedies for Manglik Yoga)
 
अगर किसी का विवाह कुण्डली के मांगलिक योग के कारण नहीं हो पा रहा है, तो ऎसे व्यक्ति को मंगल वार के दिन चण्डिका स्तोत्र का पाठ मंगलवार के दिन तथा शनिवार के दिन सुन्दर काण्ड का पाठ करना चाहिए. इससे भी विवाह के मार्ग की बाधाओं में कमी होती है.

छुआरे सिरहाने रख कर सोना
यह उपाय उन व्यक्तियों को करना चाहिए. जिन व्यक्तियों की विवाह

की आयु हो चुकी है. परन्तु विवाह संपन्न होने में बाधा आ रही है. इस उपाय को करने के लिये शुक्रवार की रात्रि में आठ छुआरे जल में उबाल कर जल के साथ ही अपने सोने वाले स्थान पर सिरहाने रख कर सोयें तथा शनिवार को प्रातर: स्नान करने के बाद किसी भी बहते जल में इन्हें प्रवाहित कर दें.

कुछ ग्रहों के अशुभ प्रभाव के कारण कन्या के विवाह में विलंब हो तो इस प्रकार के उपाय स्वयं कन्या द्वारा करवाने से विवाह बाधाएं दूर होती है.


किसी भी माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से चांदी की छोटी कटोरी में गाय का दूध लेकर उसमें शक्कर एवंउबलेहुए चांवल मिलाकर चंद्रोदय के समय चंद्रमा को तुलसी की पत्ती डालकर यह नेवैद्य बताएं व प्रदक्षिणा करें, इस प्रकार यह नियम 45 दिनों तक करें ,45 ङ्घह्न दिन पूर्ण होने पर एक कन्या को भोजन करवाकर वस्त्र और मेंहदी दान करें, ऐसाकरने से सुयोग्य वर की प्राप्ति होकर शीघ्र मांगलिक कार्य संपन्न होता है ।

गुरूवार के दिन प्रातरूकाल नित्यकर्म से निवतृत होकर हल्दीयुक्त रोटियां बनाकर प्रत्येक रोटी पर गुड़ रखें व उसे गाय को खिलाएं ।7 गुरूवार नियमित रूप से यह विधि करने से शीघ्र विवाह होता है ।

मंगलवार के दिन देवी -मंदिर में लाल गुलाब का फूल चढ़ाएं पूजन करें एवं मंगलवार का व्रत रखें । यह कार्य नौ मंगलवार तक करे । अंतिम मंगलवार को9 ख् वर्ष की नौ कन्याओं को भोजन करवाकर लाल वस्त्र, मेंहदी एवं यथाशक्ति दक्षिण दें, शीघ्र फल की प्राप्ति होगी ।

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि नंद गोपसुतं देविपतिं में कुरू ने नमर: । माँ कात्यायनि देवी या पार्वती देवी के फोटो को सामने रखकर जो कन्या पूजन कर इस कात्यायनि मंत्र की 1 माला का जाप प्रतिदिन करती है , उस कन्या की विवाह बधा शीघ्र दूर होती है ।

१. यदि कन्या की शादी में कोई रूकावट आ रही हो तो पूजा वाले 5 नारियल लें ! भगवान शिव की मूर्ती या फोटो के आगे रख कर “ऊं श्रीं वर प्रदाय श्री नामः” मंत्र का पांच माला जाप करें फिर वो पांचों नारियल शिव जी के मंदिर में चढा दें ! विवाह की बाधायें अपने आप दूर होती जांयगी !

२. प्रत्येक सोमवार को कन्या सुबह नहा-धोकर शिवलिंग पर “ऊं सोमेश्वराय नमः” का जाप करते हुए दूध मिले जल को चढाये और वहीं मंदिर में बैठ कर रूद्राक्ष की माला से इसी मंत्र का एक माला जप करे ! विवाह की सम्भावना शीघ्र बनती नजर आयेगी

ज्योतिष सीखें - भाग 2

Learn Astrology Part:2 (Hindi)
ज्योतिष सीखें - भाग 2
राशि, ग्रह, एवं राशि स्‍वामियों के बारे में जाना। वह अत्‍यन्‍त ही महत्‍वपूर्ण सूचना थी और उसे कण्‍ठस्‍थ करने की कोशिश करें। इस बार हम ग्रह एवं राशियों के कुछ वर्गीकरण को जानेंगे जो कि फलित ज्‍योतिष के लिए अत्‍यन्‍त ही महत्‍वपूर्ण हैं। पहला वर्गीकरण शुभ ग्रह और पाप ग्रह का इस
प्रकार है -
शुभ ग्रह: चन्द्रमा, बुध, शुक्र, गुरू हैं
पापी ग्रह: सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु हैं

साधारणत चन्‍द्र एवं बुध को सदैव ही शुभ नहीं गिना जाता। पूर्ण चन्‍द्र अर्थात पूर्णिमा के पास का चन्‍द्र शुभ एवं अमावस्‍या के पास का चन्‍द्र शुभ नहीं गिना जाता। इसी प्रकार बुध अगर शुभ ग्रह के साथ हो तो शुभ होता है और यदि पापी ग्रह के साथ हो तो पापी हो जाता है।
यह ध्‍यान रखने वाली बात है कि सभी पापी ग्रह सदैव ही बुरा फल नहीं देते। न ही सभी शुभ ग्रह सदैव ही शुभ फल देते हैं। अच्‍छा या बुरा फल कई अन्‍य बातों जैसे ग्रह का स्‍वामित्‍व, ग्रह की राशि स्थिति, दृष्टियों इत्‍यादि पर भी निर्भर करता है जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।
जैसा कि उपर कहा गया एक ग्रह का अच्‍छा या बुरा फल कई अन्‍य बातों पर निर्भर करता है और उनमें से एक है ग्रह की राशि में स्थिति। कोई भी ग्रह सामान्‍यत अपनी उच्‍च राशि, मित्र राशि, एवं खुद की राशि में अच्‍छा फल देते हैं। इसके विपरीत ग्रह अपनी नीच राशि और शत्रु राशि में बुरा फल देते हैं।

ग्रहों की उच्‍चादि राशि स्थिति इस प्रकार है -

ग्रह
उच्च राशि
नीच राशि
स्‍वग्रह राशि
1
सूर्य,मेष
तुला
सिंह
2
चन्द्रमा,  वृषभ
वृश्चिक
कर्क
3
मंगल,   मकर
 कर्क
मेष, वृश्चिक
4
बुध, कन्या
मीन          
मिथुन, कन्या
5
 गुरू,   कर्क  
मकर 
 धनु, मीन
शुक्र,   मीन        
कन्या 
वृषभ, तुला
7
शनि,  तुला                मेष मकर, कुम्भ
8
 राहु, धनु           मिथुन
9
केतु    मिथुनधनु

उपर की तालिका में कुछ ध्‍यान देने वाले बिन्‍दु इस प्रकार हैं -
1 ग्रह की उच्‍च राशि और नीच राशि एक दूसरे से सप्‍तम होती हैं। उदाहरणार्थ सूर्य मेष में उच्‍च का होता है जो कि राशि चक्र की पहली राशि है और तुला में नीच होता है जो कि राशि चक्र की सातवीं राशि है।

2 सूर्य और चन्‍द्र सिर्फ एक राशि के स्‍वामी हैं। राहु एवं केतु किसी भी राशि के स्‍वामी नहीं हैं। अन्‍य ग्रह दो-दो राशियों के स्‍वामी हैं।

3 राहु एवं केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती। राहु-केतु की उच्‍च एवं नीच राशियां भी सभी ज्‍योतिषी प्रयोग नहीं करते हैं।

क्रमश....

Wednesday, April 27, 2011

ज्योतिष सीखें - भाग 1

Learn Astrology Part:1
ज्योतिष सीखने की इच्छा अधिकतर लोगों में होती है। लेकिन उनके सामने समस्या यह होती है कि ज्योतिष की शुरूआत कहाँ से की जाये?
कुछ जिज्ञासु मेहनत करके किसी ज्यातिषी को पढ़ाने के लिये राज़ी तो कर लेते हैं,
लेकिन गुरूजी कुछ इस तरह ज्योतिष पढ़ाते हैं कि जिज्ञासु ज्योतिष सीखने की बजाय भाग खड़े होते हैं। बहुत से पढ़ाने वाले ज्योतष की शुरुआत कुण्डली-निर्माण से करते हैं। ज़्यादातर जिज्ञासु कुण्डली-निर्माण की गणित से ही घबरा जाते हैं। वहीं बचे-खुचे “भयात/भभोत” जैसे मुश्किल शब्द सुनकर भाग खड़े होते हैं।
अगर कुछ छोटी-छोटी बातों पर ग़ौर किया जाए, तो आसानी से ज्योतिष की गहराइयों में उतरा जा सकता है। ज्योतिष सीखने के इच्छुक नये विद्यार्थियों को कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए-
  1. शुरूआत में थोड़ा-थोड़ा पढ़ें।
  2. जब तक पहला पाठ समझ में न आये, दूसरे पाठ या पुस्तक पर न जायें।
  3. जो कुछ भी पढ़ें, उसे आत्मसात कर लें।
  4. बिना गुरू-आज्ञा या मार्गदर्शक की सलाह के अन्य ज्योतिष पुस्तकें न पढ़ें।
  5. शुरूआती दौर में कुण्डली-निर्माण की ओर ध्यान न लगायें, बल्कि कुण्डली के विश्लेषण पर ध्यान दें।
  6. शुरूआती दौर में अपने मित्रों और रिश्तेदारों से कुण्डलियाँ मांगे, उनका विश्लेषण करें।
  7. जहाँ तक हो सके हिन्दी के साथ-साथ ज्योतिष की अंग्रेज़ी की शब्दावली को भी समझें।
अगर ज्योतिष सीखने के इच्छुक लोग उपर्युक्त बिन्दुओं को ध्यान में रखेंगे, तो वे जल्दी ही इस विषय पर अच्छी पकड़ बना सकते हैं।

ज्‍योतिष के मुख्‍य दो विभाग हैं - गणित और फलित। गणित के अन्दर मुख्‍य रूप से जन्‍म कुण्‍डली बनाना आता है। इसमें समय और स्‍थान के हिसाब से ग्रहों की स्थिति की गणना की जाती है। दूसरी ओर, फलित विभाग में उन गणनाओं के आधार पर भविष्‍यफल बताया जाता है। इस शृंखला में हम ज्‍यो‍तिष के गणित वाले हिस्से की चर्चा बाद में करेंगे और पहले फलित ज्‍योतिष पर ध्यान लगाएंगे। किसी  बच्चे के जन्म के समय अन्तरिक्ष में ग्रहों की स्थिति का एक नक्शा बनाकर रख लिया जाता है इस नक्शे केा जन्म कुण्डली कहते हैं। आजकल बाज़ार में बहुत-से कम्‍प्‍यूटर सॉफ़्टवेयर उपलब्‍ध हैं और उन्‍हे जन्‍म कुण्‍डली निर्माण और  अन्‍य गणनाओं के लिए प्रयोग किया जा सकता है। पूरी ज्‍योतिश नौ ग्रहों, बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों और बारह भावों पर टिकी हुई है।
सारे भविष्‍यफल का मूल आधार इनका आपस में संयोग है। नौ ग्रह इस प्रकार हैं -

ग्रहअन्‍य नामअंग्रेजी नाम
सूर्यरविसन
चंद्रसोममून
मंगलकुजमार्स
बुधमरकरी
गुरूबृहस्‍पतिज्‍यूपिटर
शुक्रभार्गववीनस
शनिमंदसैटर्न
राहुनॉर्थ नोड
केतुसाउथ नोड

आधुनिक खगोल विज्ञान (एस्‍ट्रोनॉमी) के हिसाब से सूर्य तारा और चन्‍द्रमा उपग्रह  है, लेकिन भारतीय ज्‍योतिष में इन्‍हें ग्रहों में शामिल किया गया है। राहु और केतु गणितीय बिन्‍दु मात्र हैं और इन्‍हें भी भारतीय ज्‍योतिष में ग्रह का दर्जा हासिल है।

भारतीय ज्‍योतिष पृथ्‍वी को केन्द्र में मानकर चलती है। राशिचक्र वह वृत्त है जिसपर नौ ग्रह घूमते हुए मालूम होते हैं। इस राशिचक्र को अगर बारह भागों में बांटा जाये, तो हर एक भाग को एक राशि कहते हैं। इन बारह राशियों के नाम हैं- मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्‍या,  तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन। इसी तरह जब राशिचक्र को सत्‍ताईस  भागों में बांटा जाता है, तब हर एक भाग को नक्षत्र कहते हैं। हम नक्षत्रों  की चर्चा आने वाले समय में करेंगे।

एक वृत्त को गणित में 360 कलाओं (डिग्री) में बाँटा जाता है। इसलिए एक राशि, जो राशिचक्र का बारहवाँ भाग  है, 30 कलाओं की हुई। फ़िलहाल ज़्यादा गणित में जाने की बजाय बस इतना जानना
काफी होगा कि हर राशि 30 कलाओं की होती है।
हर राशि का मालिक एक ग्रह होता है जो इस प्रकार हैं -

राशिअंग्रेजी नाममालिक ग्रह
मेषएरीज़मंगल
वृषभटॉरसशुक्र
मिथुनजैमिनीबुध
कर्ककैंसरचन्द्र
सिंहलियोसूर्य
कन्यावरगोबुध
तुलालिबराशुक्र
वृश्चिकस्कॉर्पियोमंगल
धनुसैजीटेरियसगुरू
मकरकैप्रीकॉर्नशनि
कुम्भएक्वेरियसशनि
मीनपाइसेज़गुरू


क्रमश... 

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