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Thursday, November 8, 2018

दीपावली से जुडी लक्ष्मी कथा

दीपावली से जुडी लक्ष्मी कथा
Article courtesy: GURUTVA JYOTISH Monthly E-Magazine November-2018
लेख सौजन्यगुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (नवम्बर-2018) 
भारतीय संस्कृति में दीपावली के त्योहार कि बड़ी लोक प्रिय कथा प्रचलित हैं।
कथा: एक बार कार्तिक मास की अमावस को लक्ष्मीजी पृथ्वी भ्रमण पर निकलीं। अमावस कि काली छाया के कारण पृथ्वी के चारों ओर अंधकार व्याप्त था। जिस कारण देवी लक्ष्मी रास्ता भूल गईं। लक्ष्मी जी नी निश्चय किया कि रात्रि का प्रहर वे मृत्युलोक में व्यतीत कर लेंगी और सूर्योदय के पश्चात पुनः बैकुंठधाम लौट जाएँगी, परंतु लक्ष्मी जी ने पाया कि पृथ्वी पर सभी लोग अपने-अपने घरों में द्वा बंद कर सो रहे हैं।
तभी अंधकार से भरे पृथ्वी लोक में उन्हें एक द्वा खुला दिखा जिसमें एक दीपक कि ज्योति टिमटिमा रही थी। लक्ष्मी जी उस प्रकाश कि ओर पहुंच कर वहाँ उन्होंने एक वृद्ध महिला को चरखा चलाते देखा। वृद्ध महिला से रात्रि विश्राम की अनुमति माँग कर लक्ष्मी जी बुढ़िया की कुटिया में रुकीं।
वृ्द्ध महिला ने लक्ष्मी जी को विश्राम के लिये बिस्तर प्रदान कर पुन: अपने कार्य में व्यस्त हो गई। चरखा          चलाते-चलाते वृ्द्धा की आँख लग गई। दूसरे दिन उठने पर वृद्ध महिला ने पाया कि अतिथि महिला वहां से जा चुकी हैं लेकिन कुटिया के स्थान पर विशालमहल खड़ा था। जिसमें चारों ओर धन-धान्य, रत्न-जेवरात इत्यादि बिखरे हुए थे।
एसी मान्यता हैं कि तभी से कार्तिक अमावस (दीपावली)कि रात को दीप जलाने की प्रथा चली आरही हैं। दीपावली के रात्री काल में लोग द्वा खोलकर लक्ष्मीदेवी के आगमन कि प्रतीक्षा करने कि परंपरा चली आरही हैं।
क्योकी लोगो का तत्पर्य यह हैं कि माँ लक्ष्मी देवी जिस प्रकार उस वृद्धा पर प्रसन्न हुईं उसी प्रकार सब पर प्रसन्न हों।
कथा सार: दीपावली कि रात मात्र दीप जलाने और द्वा खुले रखने से लक्ष्मी जी घर में निवास नहीं करती! लक्ष्मी जी विश्राम करती हैं। क्योंकि देवी लक्ष्मी तो चंचल हैं। वह एक स्थान पर अस्थिर नहीं रहती। अपना आशिष देकर चलीजाती हैं। जिसके फल स्वरुप आने वाले वर्ष भव में मां लक्ष्मी के भक्त को किसी प्रकार के दुःख, दरिद्रता एवं आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पडता।
***
GURUTVA JYOTISH E-MAGAZINE NOVEMBER-2018
(File Size : 7.07 MB)
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Article courtesy: GURUTVA JYOTISH Monthly E-Magazine November-2018
लेख सौजन्यगुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (नवम्बर-2018) 

लक्ष्मी प्रद कुबेर साधना

लक्ष्मी प्रद कुबेर साधना
Article courtesy: GURUTVA JYOTISH Monthly E-Magazine November-2018
लेख सौजन्यगुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (नवम्बर-2018) 
हिन्दू धर्म में धन कि देवी लक्ष्मी एवं धन के देवता कुबेर माने जाते हैं। इस लिये कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) एवं दीपावली पर मां लक्ष्मी के साथ धनके देवता एवं नव निधिओं के स्वामी कुबेर कि पूजा-अर्चना कि जाती हैं। लक्ष्मी एवं कुबेर कि पूजा से व्यक्ति कि समस्त भौतिक मनोकामनाएं पूर्ण होकर धन-पुत्र इत्यादि कि प्राप्ति होती हैं। क्योकि आज के भौतिकता वादी युग में मानव जीवन का संचालन सुचारु रुप से चल सके इस लिये अर्थ(धन) सबसे महत्व पूर्ण साधन हैं।  अर्थ(धन) के बिना मनुष्य जीवन दुःख, दरिद्रता, रोग, अभावों से पीडित होता हैं। अर्थ(धन) से युक्त मनुष्य जीवन में समस्त सुख-सुविधाएं भोगता हैं।
मां महालक्ष्मी के साथ कुबेर का पूजन करने का विशेष महत्व हमारे शास्त्रों मे वर्णित हैं।  
कुबेर दशो दिशाओं के दिक्पालों में से एक उत्तर दिशा के अधिपति देवता हैं। कुबेर मनुष्य कि सभी भौतिक कामनाओं को पूर्ण कर धन वैभव प्रदान करने में समर्थ देव हैं। इसलिए कुबेर कि पूजा-अर्चना से उनकी प्रसन्नता प्राप्त कर मनुष्य सभी प्रकार के वैभव(धन) प्राप्त कर लेता हैं। धन त्रयोदशी एवं दीपावली पर कुबेर कि विशेष पूजा-अर्चना कि जाती हैं जो शीघ्र फल प्रदान करने वाली मानी जाती हैं। जो मनुष्य धन प्राप्ति कि कामना करते हैं, उनके लिये प्राण-प्रतिष्ठित कुबेर यंत्र श्रेष्ठ हैं। व्यापार-धन-वैभव में वृद्धि, सुख शांति कि प्राप्ति हेतु कुबेर यंत्र श्रेष्ठ हैं।

धनतेरस, दीपावली के दिन अपने पूजा स्थान में कुबेर यंत्र स्थापित करें।
अखंडित कुबेर यंत्र स्वर्ण, रजतताम्र पत्र निर्मित हो, तो अति उत्तम यदि उपलब्ध न हो, तो भोजपत्र, कागज पर निर्मित कर पूजन सकते हैं।

यंत्र स्थापना विधि:
प्रात:काल स्नानादि से निवृत होकर उत्तर-पूर्व कि और मुख करके स्वच्छ आसन पर बैठें। अपने सामने पूजन सामग्री एवं माला व अखंडित कुबेर यंत्र को एक लकडी कि चोकी (बाजोट) पर रख दें। सर्व प्रथम आचमन प्राणायाम करके संकल्पपूर्वक गणेशाधि देवताओं का ध्यान करके उनका पूजन करें, फिर किसी ताम्र पात्र में कुबेर यंत्र को रखकर कुबेर का ध्यान करें।
ध्यान मंत्र
मनुजवाह्य विमानवरस्थितं गुरूडरत्नानिभं निधिनाकम्। शिव संख युकुतादिवि भूषित वरगदे दध गतं भजतान्दलम्।।

ध्यान के पश्चयात नीचे दिये मंत्र में से किसी एक मंत्र का 1,3,5,7,11,21  माला यथाशक्ति माला जप करें।
कुबेर  मंत्र-

अष्टाक्षर मंत्र- ॐ वैश्रवणाय स्वाहा:
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षोडशाक्षर मंत्र- ॐ श्री ऊँ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वितेश्वराय नम:।
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पंच त्रिंशदक्षर मंत्र- ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याथिपतये धनधान्यासमृद्धि दोहि द्रापय स्वाहा।

मंत्र जप समाप्ती के पश्चयात यंत्र को अपने पूजन स्थान में स्थापीत करके प्रतिदिन धूप-दीप इत्यादी से पूजन कर प्रतिदिन संभव होतो कम से कम एक माला जप करें। प्रतिदिन जप करने से अधिक लाभ प्राप्त होता हैं।
GURUTVA JYOTISH E-MAGAZINE NOVEMBER-2018
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Article courtesy: GURUTVA JYOTISH Monthly E-Magazine November-2018
लेख सौजन्यगुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (नवम्बर-2018) 

Tuesday, November 6, 2018

मां लक्ष्मी के चमत्कार कि महिमा | Miracles Story of Goddess Lakshmi

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मां लक्ष्मी के चमत्कार कि महिमा
Article courtesy: GURUTVA JYOTISH Monthly E-Magazine November-2018
लेख सौजन्यगुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (नवम्बर-2018) 
पौराणिक काल कि बात हैं, एक दिन लक्ष्मी जी से उनकी बड़ी बहन ज्येष्ठा ने कहा, लक्ष्मी बहुत दिनों से एक बात मेरे मस्तिष्क में उठ रही हैं। मैं सोच रही हूँ कि तुमसे पूछूं या नहीं। लक्ष्मीजी ने कहा ऐसी क्या बात हैं बहन? मन में जो कुछ भी प्रश्न हैं, आप निःसंकोच पूछो। वैसे भी बुद्धिमानी उसी में हैं कि किसी भी बात को मन में न रखकर उसका समाधान कर लेना।
ज्येष्ठा ने कहा मैं अक्सर यही सोचती रहती हूँ कि हम दोनों सगी बहनें हैं, सुंदरता में हम दोनों बराबर हैं, फिर भी लोग तुम्हारा आदर करते हैं और मैं जहाँ भी जाती हूँ, वहाँ के माहोल में उदासी छा जाती हैं। बार-बार मुझे लोगों कि घृणा और क्रोध का शिकार होना पड़ता हैं। ऐसा क्यों?
लक्ष्मी जी ने हँसते हुवे कहा, सगी बहन या समान सुंदरता होने से ही आदर नहीं मिलता। आदर पाने के लिये हमें स्वयं भी कुछ करना चाहिए। लोग मेरा आदर इसलिए करते हैं क्योंकि मैं उनके घर में प्रवेश करते ही सुख के साधन जुटा देती हूँ। इस लिये सम्पत्ति और वैभव से आनंदित होकर लोग मेरा उपकार मानते हैं, मेरी पूजा करते हैं।  और तुम जिसके यहाँ भी जाती हो,  उसको ग़रीबी, रोग और कष्ट प्राप्त होता हैं। इसी लिये  लोग तुमसे घृणा करते हैं। कोई आदर नहीं करता। आदर पाने के लिये दूसरों को सुख पहुँचाओ। ज्येष्ठा को लक्ष्मी जी कि यह बात चुभ गई। ज्येष्ठा को लगा कि लक्ष्मी को अपनी महिमा का अभिमान हो गया हैं।
ज्येष्ठाने क्रोध से तिलमिलाते हुवे कर कहा, लक्ष्मी तुम मुझसे छोटी हो अवस्था में भी और प्रभाव हर बात तुम मुझसे छोटी हो। तुमहें मुझे उपदेश देने कि आवश्यकता नहीं हैं। यदि तुम्हें अपने वैभव का अहंकार हैं तो मेरे पास भी अपना एक प्रभाव हैं। मैं जब अपनी पर आ जाऊँ तो तुम्हारे करोड़पति भक्त को भी पल भर में भिखारी बना सकती हूँ। ज्येष्ठा कि बात पर लक्ष्मी जी को हँसी आ गई और कहने लगीं, बहन तुम बड़ी हो, इसलिए कुछ भी कह लो। लेकिन जहाँ तक प्रभाव कि बात है, मैं तुमसे कम नहीं हूँ। जिसको तुम भिखारी बनाओगी, उसे मैं दूसरे दिन भिखारी से फिर राजा बना दूँगी। मेरी महिमा का अभी तुम्हें पता ही कहाँ हैं। और तुम्हें भी मेरी महिमा का पता ही नहीं है। जिसकी तुम सहायता करोगी, उसे मैं दानेदाने के लिए भी मोहताज कर दूँगी। देखो बहन दाने-दाने के लिए तो तुम उसे मोहताज कर सकती हो जिससे मैं रूठ जाऊँ। जिसके सिर पर मेरा हाथ न हो, उसका तुम कुछ भी बिगाड़ सकती हो। परंतु जिस पर मेरी कृपा द्रष्टि हैं, जिसे मेंरा वरदान प्राप्त हैं उसका कोई  बाल भी बांका नहीं कर सकता।
अगर तुम अपना प्रभाव दिखाने को इतनी ही उतावली हो रही हो तो कल अपना प्रभाव दिखाकर देख लेना। बोलो, कहाँ चलें? दूर क्यों जाएँ, पास ही अनुराधापुर गांव हैं। उसमें एक ब्राह्मण रहता हैं दीनानाथ। वह रोज मंदिर में पूजा करने जाता हैं और मेरा परम भक्त हैं। उसी पर हमें अपनीअपनी महिमा दिखानी हैं। लक्ष्मी जी कि इस बात पर ज्येष्ठा को ताव आ गया। उन्होंने हाथ झटककर कहा, ठीक है, ठीक हैं। देख लेना, कल तुम्हारा सिर कैसें झुक जाएगा। कहकर वह चली गई।
लक्ष्मी जी वहीं खड़ी बहन ज्येष्ठा के क्रोध ओर अहंकार पर मुस्कराती रहीं। दूसरे दिन दोनों बहनें अनुराधापुर के विष्णु मंदिर में वेश बदल कर पहुँचीं। साधारण स्त्रियों कि तरह वे दोनों मंदिर के द्वार पर बैठ गईं। स्थानिय लोगों ने दोनों को देखा अवश्य, किंतु किसी ने उनकी ओर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया। ध्यान देने वाली कोई ख़ास बात भी नहीं थी । वह मंदिर था और वहाँ हर रोज दीन दुःखी आतेजाते रहते थे।
थोड़ी देर बाद वहाँ दीनानाथ पंडित आया। दोनों बहनों कि नजरें उस पर जम गईं। पूजा करके जब दीनानाथ लौटने लगा तो ज्येष्ठा ने कहा, लक्ष्मी वह तुम्हारा भक्त आ रहा हैं। बन पड़े तो उसकी कोई सहायता करो। हाँ, करती हूँ। कहकर लक्ष्मी जी ने एक पोला बांस दीनानाथ के रास्ते में रख दिया जिसमें सोने कि मोहरें भरी हुई थीं। ज्येष्ठा ने बांस को छूकर कहा, अब तुम मेरा प्रभाव भी देख लो। पूजा करके लौट रहे दीनानाथ ने रास्ते में पड़ा हुआ वह बांस का टुकड़ा उठा लिया। उसने विचार किया कि वह किसी काम आ जाएगा। घर में सौ ज़रूरतें होती हैं।
अभी वह पंडित कुछ ही आगे बढ़ा था कि उसे रास्ते में एक लड़का मिला। लड़के ने पहले दीनानाथ पंडित से रामराम कि, फिर बड़ी ही नम्रता से बोला, पंडित जी मुझे अपनी चारपाई के लिए बिल्कुल ऐसा ही बांस चाहिए। दादा जी ने यह कहकर भेजा हैं कि जाओ, बाज़ार से ले आओ। ऐसा बांस पंडित जी कहाँ मिलेगा? दीनानाथ ने कहा, मैंने इसे मोल देकर नहीं लिया। रास्ते में पड़ा था; सो उठा लाया। लो, तुम्हें ज़रूरत है तो तुम ही रख लो। वैसे बाज़ार में एक रुपये से कम का नहीं हैं। लड़के ने चवन्नी देते हुए कहा, मगर मेरे पास तो यह चवन्नी ही हैं, पंडित जी। अभी तो आप इसे ही रखिए, बाकी बारह आने शाम को दे जाऊँगा। पंडित जी खुश थे कि बिना किसी महेनत के एक रुपया कमा लिया। दीनानाथ पंडित ने चवन्नी लेकर बांस लड़के को दे दिया और वह चवन्नी अपनी डोलची में रख दी।
मंदिर के पास खड़ी दोनों बहनें यह सारी लीला देख रही थीं। ज्येष्ठा ने कहा, लक्ष्मी देखा तुमने? तुम्हारी इतनी सारी सोने कि मोहरें मात्र एक चवन्नी में बिक गईं। और आगे देखती जाओं यह चवन्नी भी तुम्हारे भक्त के पास नहीं रूकेगी। चलो, उसके पीछे चलते हैं और देखते हैं कि क्या होता हैं। दोनों बहने दीनानाथ के पीछेपीछे चलने लगीं। एक तालाब के पास दीनानाथ ने डोलची रख दी और कमल के फूल तोड़ने लगा। उसी बीच एक चरवाहे का लड़का आया और डोलची में रखी हुई चवन्नी लेकर भाग गया। दीनानाथ पंडित को पता ही नहीं चला। फूल तोड़कर वह अपने घर जाने लगा। इतने में वही लड़का आता हुआ दिखाई दिया जिसने चवन्नी देकर उससे बांस ले लिया था। करीब आकर वह बोला, पंडित जी यह बांस तो बहुत वज़नी हैं। दादाजी ने कहा हैं कि कोई हल्का बांस चाहिए। इसकी चारपाई ठीक न होगी। यह लीजिए, आप अपना बांस वापस ले लीजिए। कहकर उसने बांस पंडित जी के हवाले कर दिया।
दीनानाथ ने बांस ले लिया। चवन्नी वापस करने के लिये डोलची में हाथ डाला तो देखा चवन्नी तो डोलची में हैं नहीं। तब उसने कहा, बेटा, चवन्नी तो कहीं गिर गई। तुम मेरे साथ घर चलो, वहाँ से तुम्हें दूसरी दे दूँगा। इस समय मेरे पास एक भी पैसा नहीं हैं। पंडित जी तब आप जाइए। मैं शाम को आकर घर से ले लूँगा। यह कहकर लड़का अपनी राह लौट गया। बांस फिर से पंडित जी के ही पास आ गया और लक्ष्मी जी हौले से मुस्कराईं। उनको इस प्रकार मुस्कराते देखकर ज्येष्ठा मन ही मन में जल उठीं। वह बोलीं, 'अभी तो खेल शुरू ही हुआ हैं।
देखती चलो मैं इसे कैसे नाच नचाती हूँ। दीनानाथ पंडित बेचारा इन सब बातों से बेख़बर अपनी ही धुन में आगे बढ़ा चला जा रहा था। आगे चलकर गाँव का एक अहीर मिला। उसने दीनानाथ पंडित को चवन्नी वापस करते हुए बताया, पंडित जी मेरा लड़का आपकी डोलची से यह चवन्नी उठा लाया था। वह बड़ा ही शैतान हैं। मैं आपकी वही चवन्नी लौटाने आया हूँ। हो सके तो उस शैतान को माफ कर दीजिएगा। दीनानाथ पंडित ने आशीर्वाद देकर चवन्नी ले ली और प्रसन्न मन से उस लड़के को पुकारने लगा जो शाम को घर आकर चवन्नी लेने कि बात कहकर लौटा जा रहा था। आवाज़ सुनकर लड़का लौट आया। अपनी चवन्नी वापस पाकर वह भी प्रसन्न हो गया। दीनानाथ पंडित निश्चिंत मन से घर कि ओर बढ़ने लगा। उसके एक हाथ में पूजा कि डोलची थी और दूसरे में वही लम्बा बांस।
राह चलते दीनानाथ पंडित सोच रहा था, यह बांस तो काफ़ी वज़नी हैं। वज़नी हैं तो मजबूत भी होगा, क्योंकि ठोस हैं। इसे दरवाजे के छप्पर में लगा दूँगा। ज्येष्ठा को उसके विचार पर क्रोध आ गया। लक्ष्मी जी के प्रभाव से दीनानाथ पंडित को लाभ होता देख वह मन ही मन बुरी तरह जली जा रहीं थीं। जब उन्होंने देखा कि पंडित का घर क़रीब आ गया है तो कोई उपाय न पाकर उन्होंने दीनानाथ को मारने डालने का विचार किया। उन्होंने कहा, लक्ष्मी धनसम्पत्ति तो मैं छीन ही लेती हूँ, अब तुम्हारे भक्त के प्राण भी ले लूँगी। देखो, वह किस तरह तड़पतड़प कर मरता हैं।
इतना कहकर ज्येष्ठा तुरंत साँप बनकर दीनानाथ कि ओर दौड़ पड़ीं। लक्ष्मी जी को तनिक भी घबराहट नहीं हुई। वह उसी तरह खड़ी मुस्कराती रहीं। साँप देख कर सहसा दीनानाथ पंडित चौंक पड़ा। साँप फन उठाए उसकी ओर झपट रहा था। प्राण तो सभी को प्रिय होते हैं। उपाय रहते कोई अपने को संकट में नहीं पड़ने देता। दीनानाथ ने पगडंडी वाला रास्ता छोड़ दिया और एक ओर को भागने लगा। लेकिन साँप बनी ज्येष्ठा उसे भला कहाँ छोड़ने वाली थीं। वह तो उस ग़रीब के प्राणों कि प्यासी हो चुकी थीं। वह भी दीनानाथ के आगेपीछे, दाएंबाएं बराबर दौड़ती ही रहीं। दीनानाथ घबरा गया। उसने हाथ जोड़कर कहा, नाग देवता मैंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा। शांति से अपनी राह लौट जाओ। आखिर क्यों मुझ ग़रीब के पीछे पड़े हो? व्यर्थ में किसी ब्राह्मण को सताना अच्छी बात नहीं है।
लेकिन वह नाग तो ज्येष्ठा का रूप था, जो दीनानाथ पंडित को किसी भी तरह डसना चाहता था। प्रार्थना पर कुछ भी ध्यान न देकर वह साँप एक बारगी फुफकारता हुआ झपट पड़ा। जब दीनानाथ ने देख लिया कि बिना संघर्ष किए अब जान नहीं बचेगी तो उसने प्राणरक्षा के लिए भरपूर जोर लगाकर वही बांस साँप के ऊपर दे मारा। धरती से टकराते ही बांस के दो टुकड़े हो गए और उसके भीतर भरी हुईं सोने कि मोहरें खनखनाकर बिखर गईं, जैसे लक्ष्मी हँस रही हो।
दीनानाथ पंडित के मुँह से हैरतपूर्ण चीखसी निकली, अरे थोड़ी देर के लिए वह ठगासा खड़ा आँखें फाड़े, उन मोहरों कि ओर देखता रहा। एक पल के लिए तो वह साँप को भूल ही गया था। कुछ पल बाद जैसे उसे झटकासा लगा। साँप का ध्यान आते ही उसने उसकी ओर गरदन घुमायी, तो देखा कि बांस कि चोट से साँप कि कमर टूट गयी हैं और वह लहूलुहान अवस्था में झाड़ी कि ओर भागा जा रहा हैं।
दूसरे क्षण वह मोहरों पर लोट गया और कहने लगा, तेरी जय हो लक्ष्मी माता! जीवनभर का दारिद्रय आज दूर हो गया। तेरी महिमा कौन जान सकता हैं। चलो, अब घर में बैठकर तुम्हारी पूजाआरती करूँगा। और फिर जल्दीजल्दी उसने सारी मोहरें अंगोछे में बाँध दीं और लम्बेलम्बे कदमों से घर कि ओर चल दिया।
पीछे एक पेड़ कि छाया में खड़ी लक्ष्मी अपनी बहन ज्येष्ठा से मुस्कराकर पूछ रहीं थीं, कहो बहन सच बताना, बड़प्पन कि थाह मिली कि अभी नहीं? बड़प्पन किसी को कुछ देने में ही है, उससे छीनने में नहीं।
ज्येष्ठा ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह चुपचाप उदास खड़ी रहीं। लक्ष्मी जी ने उनका हाथ पकड़कर कहा, फिर भी, हम दोनों बहनें हैं। जहाँ रहेंगीं, साथ ही रहेंगीं। आओ, अब चलें।
 GURUTVA JYOTISH E-MAGAZINE NOVEMBER-2018
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Article courtesy: GURUTVA JYOTISH Monthly E-Magazine November-2018
लेख सौजन्यगुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (नवम्बर-2018) 

Monday, November 5, 2018

गुरुत्व ज्योतिष साप्ताहिक ई-पत्रिका 4 नवम्बर से 10 नवम्बर 2018 में प्रकाशित लेख | GURUTVA JYOTISH Weekly E-MAGAZIN 4-11 to 10-November 2018

GURUTVA JYOTISH Weekly E-MAGAZINE 4 November 2018 to 10 November 2018 गुरुत्व ज्योतिष साप्ताहिक ई-पत्रिका 4-नवम्बर से 10नवम्बर 2018 में प्रकाशित लेख
October-2018 Free Weekly Hindi Astrology Magazines, You can read in Monthly GURUTVA JYOTISH Magazines Astrology, Numerology, Vastu, Gems Stone, Mantra, Yantra, Tantra, Kawach & ETC Related Article absolutely free of cost.
गुरुत्व ज्योतिष ई पत्रीका 4 नवम्बर से 10 नवम्बर 2018 में प्रकशित लेख
साप्ताहिक ई-पत्रिका

GURUTVA JYOTISH E-MAGAZINE 4 NOV to 10-NOV 2018
Weekly
अनुक्रम
इस अंक में पढे़
धनतेरस शुभ मुहूर्त सोमवार 5-नवम्बर-2018 
7
दीपावली पूजन मुहूर्त बुधवार 7-नवम्बर-2018 
8
दीपावली का महत्व और लक्ष्मी पूजन विधि
9
लक्ष्मी प्रद कुबेर साधना
11
लक्ष्मी प्राप्ति के 151 सरल उपाय
13
मंत्र सिद्ध काली हल्दी के विभिन्न लाभ
21
धन प्राप्ति का अचूक उपाय स्फटिक श्रीयंत्र..
25
सप्त श्री का चमत्कारी प्रयोग
27
इस दीपावली पर स्वयं सिद्ध करें लक्ष्मी मंत्र
28
कुबेर जी के छः नामों का चमत्कार
29
देवी महालक्ष्मी के 18 पुत्र वर्ग की महिमा
29
स्थिर लक्ष्मी के लिए करें इन सात दुर्लभ..
31
धन प्राप्ति और सुख समृद्धि के लिये वास्तु..
34
धनत्रयोदशी पर यम को करे दीपदान होगा ..
35
यमदीपदान के पीछे छुपा गूढ़ आध्यात्मिक..
37
दीपावली के दिन कैसे करें बहीखाता तुला..
38
लक्ष्मी प्राप्ति का अमोघ साधन दक्षिणावर्त..
39
यम द्वितीया का महत्व
43
लक्ष्मी कवच
45
रत्नों का अद्भुत रहस्य (मूंगा )
48
प्रकृति की अलौकिक देन रुद्राक्ष
50
वर्णमाला के अनुसार स्वप्न फल विचार
85
अंक ज्योतिष का रहस्य (मूलांक 3)
55
स्थायी और अन्य लेख
संपादकीय
4
4 नवम्बर-10 नवम्बर 2018 साप्ताहिक पंचांग
72
4 - 10 नवम्बर 2018 साप्ताहिक व्रत-पर्व..
72
कार्य सिद्धि योग
78
दैनिक शुभ एवं अशुभ समय ज्ञान तालिका
78
दिन के चौघडिये
79
दिन कि होरा - सूर्योदय से सूर्यास्त तक
80

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